Wednesday, November 4, 2026

सिर्फ खरीदारी नहीं, धनतेरस का है समुद्र मंथन से खास कनेक्शन! जानिए इसकी पूरी कहानी

भारत में दिवाली की तैयारियां धनतेरस के साथ ही शुरू हो जाती हैं। रोशनी, खरीदारी और पूजा-पाठ से जुड़ा यह त्योहार हिंदू धर्म में बेहद शुभ माना जाता है। मान्यता है कि धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और भगवान कुबेर की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य और धन-धान्य का आगमन होता है।

कब है धनतेरस 2026?

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को धनतेरस मनाया जाता है। साल 2026 में धनतेरस 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि के अनुसार पूजा और खरीदारी का विशेष महत्व रहेगा।

धनतेरस क्यों मनाया जाता है?

धनतेरस मनाने के पीछे समुद्र मंथन से जुड़ी एक पौराणिक कथा प्रचलित है। मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तब भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद और चिकित्सा का देवता माना जाता है। इसी कारण इस दिन उनकी पूजा करके परिवार के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना की जाती है।

इसके अलावा, समुद्र मंथन के दौरान माता लक्ष्मी का भी प्राकट्य हुआ था। इसलिए धनतेरस पर माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर की पूजा करने की परंपरा है। इस दिन सोना, चांदी और बर्तन खरीदना भी शुभ माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं घर में सुख-समृद्धि लाती हैं।

धनतेरस कैसे मनाया जाता है?

धनतेरस के दिन लोग सुबह अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं और मुख्य द्वार पर रंगोली बनाकर दीपक जलाते हैं। शाम के समय भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की जाती है। इस दिन सोने-चांदी के आभूषण, सिक्के, नए बर्तन और अन्य उपयोगी वस्तुएं खरीदने की परंपरा है।

धनतेरस पर यमराज के नाम से भी एक दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपक कहते हैं। मान्यता है कि घर के बाहर दक्षिण दिशा में दीपक जलाने से परिवार को अकाल मृत्यु के भय से सुरक्षा मिलती है।

इस तरह धनतेरस केवल धन और खरीदारी का त्योहार नहीं है, बल्कि यह अच्छे स्वास्थ्य, सुख, शांति और समृद्धि का प्रतीक भी है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में धन के साथ-साथ स्वास्थ्य और परिवार की खुशियां भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

#Dhanteras #Mahalaxmi #Dhanwantri #Kuber 

Friday, October 30, 2026

1 या 2 नवंबर, कब है अहोई अष्टमी? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत कथा और महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत रखा जाता है। यह त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाता है। इसे अहोई आठे के नाम से भी जाना जाता है।

साल 2026 में अहोई अष्टमी का व्रत रविवार, 1 नवंबर को रखा जाएगा।

इस साल अष्टमी तिथि दो तारीखों में पड़ने के कारण लोगों के बीच भ्रम है, लेकिन शाम के समय अष्टमी तिथि और तारों की पूजा के महत्व को देखते हुए 1 नवंबर को ही व्रत करना उचित माना गया है।

अहोई अष्टमी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त:

  • अहोई अष्टमी व्रत: 1 नवंबर 2026, रविवार
  • अष्टमी तिथि प्रारंभ: 1 नवंबर, दोपहर 2:51 बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त: 2 नवंबर, दोपहर 1:10 बजे
  • अहोई माता पूजा मुहूर्त: शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक
  • पूजा की अवधि: 1 घंटा 18 मिनट
  • तारों को देखने का समय: लगभग शाम 6 बजे

नोट: पूजा मुहूर्त और तारों के दर्शन का समय नई दिल्ली के पंचांग पर आधारित है। अलग-अलग शहरों में स्थानीय सूर्यास्त के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।

अहोई अष्टमी का क्या है महत्व?

अहोई अष्टमी का त्योहार मां और संतान के प्रेम, विश्वास और आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है। इस दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और खुशहाल जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई माता की पूजा करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

परंपरागत रूप से यह व्रत बेटों की लंबी उम्र और खुशहाली के लिए रखा जाता था, लेकिन अब माताएं बेटों के साथ-साथ बेटियों के अच्छे स्वास्थ्य, उज्ज्वल भविष्य और लंबी उम्र के लिए भी यह व्रत करती हैं।

कुछ महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना से भी अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं।

यह त्योहार करवा चौथ के लगभग चार दिन बाद और दिवाली से करीब आठ दिन पहले आता है।

क्यों मनाई जाती है अहोई अष्टमी? जानें धार्मिक मान्यता

अहोई अष्टमी से जुड़ी एक प्रचलित लोककथा के अनुसार, एक साहूकार की पत्नी अपने घर की मरम्मत के लिए मिट्टी खोदने जंगल गई थी। मिट्टी खोदते समय अनजाने में उसकी कुदाल से स्याहू नामक जंगली जीव के एक बच्चे की मृत्यु हो गई।

इस घटना से स्याहू माता नाराज हो गईं और साहूकार की पत्नी को संतान से जुड़े दुख का सामना करना पड़ा। उसकी सातों संतानों के जीवन पर संकट आ गया।

इस दुख से परेशान होकर महिला ने अपनी गलती के लिए पश्चाताप किया और अहोई माता की श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना की। उसने संतान की रक्षा और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना की।

उसकी भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न होकर माता ने उसे आशीर्वाद दिया और उसकी संतानों को फिर से सुख प्राप्त हुआ।

तभी से अहोई माता की पूजा और संतान की लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखने की परंपरा प्रचलित मानी जाती है।

यह कथा विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग रूपों में सुनाई जाती है और इसे पारंपरिक लोक व्रत कथा के रूप में माना जाता है।

अहोई अष्टमी की पूजा कैसे करें? जानें पूरी विधि

अहोई अष्टमी के दिन माताएं सुबह से ही व्रत की तैयारी शुरू कर देती हैं। इस दिन पूजा विशेष रूप से शाम के समय की जाती है।

1. सुबह स्नान और व्रत का संकल्प

व्रत रखने वाली महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और साफ कपड़े पहनती हैं। इसके बाद अहोई माता का ध्यान करके अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए व्रत का संकल्प लेती हैं।

2. अहोई माता की तस्वीर बनाएं या स्थापित करें

शाम की पूजा के लिए घर की दीवार पर गेरू से अहोई माता की तस्वीर बनाई जाती है। तस्वीर में माता के साथ स्याहू और उसके बच्चों का चित्र भी बनाया जाता है।

आजकल बहुत से घरों में अहोई माता का कैलेंडर या तस्वीर लगाकर भी पूजा की जाती है।

3. पूजा की सामग्री तैयार करें

पूजा के लिए अहोई माता की तस्वीर, रोली, अक्षत, फूल, दीपक, जल से भरा कलश, मिठाई, हलवा, पूरी और अन्य प्रसाद तैयार रखें।

कुछ परिवारों में चांदी की अहोई या स्याहू की प्रतिमा रखकर भी पूजा की जाती है।

4. अहोई माता की पूजा और व्रत कथा

शाम के समय शुभ मुहूर्त में अहोई माता के सामने दीपक जलाएं। माता को रोली, अक्षत, फूल और प्रसाद अर्पित करें।

इसके बाद परिवार की महिलाएं एक साथ बैठकर अहोई माता की व्रत कथा सुनती हैं। कथा पूरी होने के बाद माता की आरती की जाती है और संतान की खुशहाली के लिए प्रार्थना की जाती है।

5. तारों को अर्घ्य देकर खोलें व्रत

अहोई अष्टमी के दिन तारों का विशेष महत्व होता है। पूजा के बाद शाम को आसमान में तारे दिखाई देने पर उन्हें जल अर्पित किया जाता है।

तारों को अर्घ्य देने के बाद माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करती हैं। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार व्रत खोला जाता है।

कुछ परिवारों में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने की परंपरा भी है।

अहोई अष्टमी पर किन बातों का रखें ध्यान?

  • व्रत के दिन साफ-सफाई और पूजा की पवित्रता का विशेष ध्यान रखें।
  • पूजा के समय अहोई माता की व्रत कथा जरूर सुनें।
  • अपनी पारिवारिक और क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार पूजा करें।
  • संतान के प्रति प्रेम, आशीर्वाद और सकारात्मक भाव बनाए रखें।
  • निर्जला व्रत रखने की परंपरा है, लेकिन अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।

अहोई अष्टमी का त्योहार देता है मां के प्रेम और आशीर्वाद का संदेश

अहोई अष्टमी केवल एक व्रत या धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि यह मां और संतान के बीच अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक भी है। इस दिन माताएं अपनी संतान की खुशहाली के लिए पूरे दिन उपवास रखती हैं और अहोई माता से परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं।

इस साल 1 नवंबर को अहोई माता की पूजा करें और अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करें।

अहोई माता सभी बच्चों को सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु होने का आशीर्वाद दें। 🙏

#ahoiashtami #festival 

 

Tuesday, October 27, 2026

29 या 30 अक्टूबर, कब है करवा चौथ? जानिए पूजा की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और चंद्रोदय का समय

करवा चौथ का त्योहार सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करते हुए व्रत रखती हैं। साल 2026 में करवा चौथ की तारीख को लेकर कुछ लोगों के मन में असमंजस है कि यह व्रत 29 अक्टूबर को रखा जाएगा या 30 अक्टूबर को। आइए जानते हैं सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और चांद निकलने का संभावित समय।



करवा चौथ 2026 कब है?

पंचांग के अनुसार, इस साल करवा चौथ का व्रत गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को रखा जाएगा। यह पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, चतुर्थी तिथि 29 अक्टूबर को देर रात 1 बजकर 6 मिनट पर शुरू होगी और उसी दिन रात 10 बजकर 9 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए व्रत 30 अक्टूबर के बजाय 29 अक्टूबर को रखा जाएगा।

करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त

करवा चौथ की पूजा शाम के समय की जाती है। प्रकाशित पंचांग के अनुसार, 29 अक्टूबर को पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 38 मिनट से 6 बजकर 56 मिनट तक रहने का अनुमान है। इस दौरान महिलाएं भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और करवा माता की पूजा करती हैं। इसके बाद करवा चौथ की व्रत कथा सुनी जाती है।



कब निकलेगा करवा चौथ का चांद?

करवा चौथ के दिन चंद्रमा के दर्शन का विशेष महत्व होता है। नई दिल्ली में 29 अक्टूबर को चंद्रोदय लगभग रात 8 बजकर 17 मिनट पर होने का अनुमान है। हालांकि, चांद निकलने का वास्तविक समय शहर और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। इसलिए व्रत रखने वाली महिलाओं को अपने शहर का चंद्रोदय समय जरूर जांच लेना चाहिए।

इस दिन महिलाएं सुबह सरगी ग्रहण करने के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं। शाम को पूजा की थाली सजाकर विधि-विधान से पूजा और कथा की जाती है। चंद्रमा दिखाई देने पर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार व्रत खोला जाता है।

ध्यान दें: पूजा मुहूर्त और चंद्रोदय के समय में स्थान के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि अवश्य करें।

#karwachauth #festivals #vrat

Thursday, October 22, 2026

24 या 25, कब है शरद पूर्णिमा? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसका धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व माना जाता है। आश्विन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पावन पर्व भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला, चंद्रदेव की उपासना और माता लक्ष्मी की पूजा से जुड़ा है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है और उसकी चांदनी को अमृत के समान शुभ माना जाता है। इस दिन भक्त व्रत रखते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और खीर बनाकर चंद्रमा की रोशनी में रखते हैं।



शरद पूर्णिमा 2026 कब है?

वर्ष 2026 में शरद पूर्णिमा रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को दिन में शुरू होकर 26 अक्टूबर की सुबह तक रहेगी। चूंकि शरद पूर्णिमा का मुख्य धार्मिक अनुष्ठान पूर्णिमा की रात में किया जाता है, इसलिए इसका प्रमुख पर्व 25 अक्टूबर की शाम और रात को मनाया जाएगा।

शरद पूर्णिमा 2026 की तिथि और शुभ समय

नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार, शरद पूर्णिमा के प्रमुख समय इस प्रकार हैं:

  • पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 25 अक्टूबर 2026, सुबह 11:55 बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 26 अक्टूबर 2026, सुबह 9:41 बजे
  • चंद्रोदय का समय: 25 अक्टूबर को शाम लगभग 5:00 बजे
  • कोजागरी लक्ष्मी पूजा का निशीथ मुहूर्त: रात 11:40 बजे से 26 अक्टूबर को रात 12:31 बजे तक

ये समय नई दिल्ली के पंचांग पर आधारित हैं। आपके शहर के अनुसार चंद्रोदय और पूजा के मुहूर्त में थोड़ा अंतर हो सकता है। पूजा करने से पहले स्थानीय पंचांग देखना उचित रहेगा।

शरद पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है?

शरद पूर्णिमा मनाने के पीछे कई धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

1. भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला

ब्रज की धार्मिक परंपरा के अनुसार, शरद पूर्णिमा की चांदनी रात भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य महारास लीला से जुड़ी है। मान्यता है कि वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। इसी कारण मथुरा, वृंदावन और ब्रज क्षेत्र के कई मंदिरों में इस अवसर पर विशेष पूजा, भजन और धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।



2. माता लक्ष्मी की पूजा और समृद्धि की कामना

शरद पूर्णिमा को कई क्षेत्रों में कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस रात माता लक्ष्मी की पूजा करने और जागरण करने की परंपरा है। लोकमान्यता के अनुसार, माता लक्ष्मी रात में भ्रमण करती हैं और यह देखती हैं कि कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है। भक्त सुख, समृद्धि, धन-धान्य और परिवार की खुशहाली के लिए माता लक्ष्मी से प्रार्थना करते हैं।



3. चंद्रदेव की उपासना

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की पूजा और दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस रात चंद्रमा अपनी सभी सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है। भक्त चंद्रदेव को अर्घ्य देते हैं और जीवन में शांति, सकारात्मकता तथा सुख की कामना करते हैं।

4. खीर को चांदनी में रखने की परंपरा

शरद पूर्णिमा पर दूध और चावल से बनी खीर तैयार करके उसे चंद्रमा की रोशनी में रखने की परंपरा है। लोकविश्वास है कि इस रात की चांदनी में अमृत के समान गुण होते हैं। इसके बाद खीर को भगवान को भोग लगाकर प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बांटा जाता है। यह एक पारंपरिक धार्मिक मान्यता है, वैज्ञानिक रूप से सिद्ध स्वास्थ्य लाभ नहीं।



शरद पूर्णिमा की पूजा कैसे करें?

शरद पूर्णिमा के दिन श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार पूजा करते हैं। सामान्य रूप से पूजा की विधि इस प्रकार है:

1. घर और पूजा स्थल की सफाई करें: सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को साफ करें। मंदिर में दीपक जलाकर भगवान का स्मरण करें।

2. भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी की पूजा करें: भगवान श्रीकृष्ण, माता लक्ष्मी और अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्य देवी-देवताओं की पूजा करें। फूल, धूप, दीप और मिठाई अर्पित करें।

3. चंद्रदेव को अर्घ्य दें: शाम को चंद्रोदय होने पर चंद्रमा के दर्शन करें और परंपरा के अनुसार जल अर्पित करके सुख-शांति की प्रार्थना करें।

4. खीर बनाकर भोग लगाएं: दूध, चावल और चीनी से खीर तैयार करें। कई परिवार खीर को ढककर चांदनी में रखते हैं और बाद में भगवान को अर्पित करके प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।

5. माता लक्ष्मी की आराधना करें: जो भक्त कोजागरी पूजा करते हैं, वे अपनी परंपरा के अनुसार रात में माता लक्ष्मी की विशेष पूजा कर सकते हैं। लक्ष्मी मंत्रों का जाप, आरती और भजन-कीर्तन भी किए जाते हैं।

6. भजन-कीर्तन और ध्यान करें: इस पावन रात को भगवान का नाम जपें, श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण करें और परिवार के साथ धार्मिक गतिविधियों में भाग लें।

पूजा के नियम अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकते हैं। इसलिए व्रत या विशेष अनुष्ठान करने वाले श्रद्धालु स्थानीय पंचांग और अपनी पारिवारिक परंपरा का पालन करें।

शरद पूर्णिमा का आध्यात्मिक संदेश

शरद पूर्णिमा केवल चंद्रमा की सुंदरता का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भक्ति, आस्था, प्रेम और समृद्धि का भी प्रतीक है। भगवान श्रीकृष्ण की महारास लीला प्रेम और समर्पण का संदेश देती है, जबकि माता लक्ष्मी की पूजा सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ी है।

इस दिन चंद्रमा की शीतल चांदनी हमें मन की शांति, सकारात्मक विचारों और जीवन में संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देती है। परिवार के साथ पूजा करना, प्रसाद बांटना और जरूरतमंदों की सहायता करना भी इस पर्व की भावना को सार्थक बनाता है।

निष्कर्ष

शरद पूर्णिमा 2026 रविवार, 25 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस अवसर पर भक्त भगवान श्रीकृष्ण, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की आराधना करेंगे। खीर बनाना, चंद्रमा को अर्घ्य देना, भजन-कीर्तन करना और रात्रि में पूजा करना इस पर्व की प्रमुख परंपराएं हैं।

आइए, इस शरद पूर्णिमा पर भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी से प्रार्थना करें कि सभी के जीवन में सुख, शांति, प्रेम और समृद्धि बनी रहे।

शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं!

नोट: पूजा और चंद्रोदय के सटीक समय के लिए अपने शहर का पंचांग अवश्य देखें।

#SharadPurnima #Krishna #MaaLaxmi #Kheer

Tuesday, April 21, 2026

भगवान हनुमान के अद्भुत रहस्य: शक्ति ही नहीं, भक्ति और बुद्धि के भी प्रतीक!

जानिए हनुमान जी से जुड़े ऐसे प्रेरणादायक तथ्य, जो उन्हें सबसे महान और पूजनीय देवताओं में शामिल करते हैं।


हनुमान से जुड़े कई रोचक और प्रेरणादायक प्रसंग हैं, जो उन्हें सबसे शक्तिशाली और पूजनीय देवताओं में से एक बनाते हैं।

हनुमान जी को शिव का अवतार माना जाता है। उनका जन्म अंजना और केसरी के घर हुआ था, इसलिए उन्हें “अंजनी पुत्र” कहा जाता है। वहीं वायु देव को उनका आध्यात्मिक पिता माना जाता है, इसी कारण वे “पवन पुत्र” के नाम से भी प्रसिद्ध हैं।

बचपन में हनुमान जी बहुत चंचल और शरारती थे। एक बार उन्होंने उगते हुए सूर्य को फल समझकर निगलने की कोशिश की, जिससे देवता भी आश्चर्यचकित रह गए। बाद में ऋषियों ने उन्हें श्राप दिया कि वे अपनी शक्तियों को भूल जाएंगे, जब तक कोई उन्हें उनकी शक्ति का स्मरण न कराए।

रामायण में हनुमान जी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका देखने को मिलती है। उन्होंने राम की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया। समुद्र पार करना, लंका पहुंचकर सीता माता का पता लगाना और लंका दहन करना उनके अद्वितीय साहस के उदाहरण हैं।

एक और मान्यता के अनुसार, हनुमान जी “चिरंजीवी” यानी अमर हैं। कहा जाता है कि वे आज भी जीवित हैं और जहां भी राम का नाम लिया जाता है, वहां उनकी उपस्थिति होती है।

हनुमान जी केवल शक्ति के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे बुद्धि, भक्ति और विनम्रता के भी आदर्श हैं। उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि उन्होंने अपना हृदय चीरकर उसमें राम और सीता माता को दिखाया था। यही कारण है कि उन्हें सच्ची भक्ति और निस्वार्थ सेवा का सर्वोत्तम प्रतीक माना जाता है।

#Hanumanji 

सिर्फ खरीदारी नहीं, धनतेरस का है समुद्र मंथन से खास कनेक्शन! जानिए इसकी पूरी कहानी

भारत में दिवाली की तैयारियां धनतेरस के साथ ही शुरू हो जाती हैं। रोशनी , खरीदारी और पूजा - पाठ से जुड़ा यह त्योहार हिंदू ...